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समाज

wordsofaditya Poetry · philosophical

समाज

समाज हज़ारों सद्भावनाओं में बँटा हुआ है,
लेकिन सद्भावनाओं की भी हज़ारों भावनाएँ होती हैं।
कुछ लोगों के लिए सती सही होती है और कुछ लोगों के लिए ग़लत,

Aditya Sharma 1 / 4
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लेकिन भूख लगना हर एक समाज में ग़लत होता है।
क्यों इंसान के लिंग से उसे समाज की उत्पीड़नाएँ झेलनी पड़ती हैं?
समाज अपने आप में नासमझ अंग है।
कुछ लोग समाज को अलग हिस्सेदारियों में बाँट देते हैं,

Aditya Sharma 2 / 4
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एक हिस्सा है कौन किसको पूजता है,
एक हिस्सा है कोई अपने नाम के पीछे कौन-सा नाम लगाता है,
एक हिस्सा है कि किसके पास शरीर के कितने अंग हैं,
और एक हिस्सा है किसके पास कितने पैसे हैं।

Aditya Sharma 3 / 4
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यह समाज इंसान को इंसान के अलावा सब समझता है,
और बस यह समझ आते-आते इंसान ख़ुद को छोड़कर समाज के लिए जीने लगता है,
यहाँ आते-आते इंसान मर जाता है।

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