सफ़र का कोई किनारा
melancholic
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सफ़र का कोई किनारा
सफ़र का कोई किनारा कभी नहीं मिलता,
हर क़दम पे नया इशारा कभी नहीं मिलता।
राहों में बिखरी हैं यादों की परछाइयाँ,
मगर सच का उजियारा कभी नहीं मिलता।
हर मंज़िल पे ठहरकर सोचा मैंने यह,
कि मंज़िल से सहारा कभी नहीं मिलता।
आँखों में देखे मंज़र सिमट गए दिल में,
पर दिल से गुज़रा नज़ारा कभी नहीं मिलता।
जाने कितनी मौतें रोज़ जी लेता हूँ,
मगर जीने का सहारा कभी नहीं मिलता।
थकान से टूटी रूह संभल जाती है,
मौत का कोई किनारा कभी नहीं मिलता।
आदित्य लिखता है तन्हाई की सच्चाई,
क्योंकि रूह का इशारा कभी नहीं मिलता।