शहर के भीतर एक जंगल है
philosophical
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शहर के भीतर एक जंगल है
दिल्ली की सड़कों पर चलते हुए
मुझे अक्सर लगता है,
यह शहर नहीं, एक जंगल है।
यहाँ हर इंसान एक दरख़्त है,
जड़ें ज़मीन में गड़ी हैं,
पर टहनियाँ आसमान की तरफ़ बढ़ती हैं।
और मैं?
मैं वह बीज हूँ
जो अभी तय नहीं कर पाया
कि जड़ बनूँ या पंख।
शहर ने मुझसे एक सवाल पूछा,
"तुम यहाँ क्यों आए हो?"
मैंने कहा, "रोशनी के लिए।"
उसने हँसकर कहा,
"यहाँ रोशनी नहीं बिकती,
यहाँ सिर्फ़ रोशनी का भ्रम बिकता है।"
और मैं चुपचाप
उस भ्रम को ख़रीदने की
क़ीमत लगाने लगा।