परछाईं का पता
melancholic
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परछाईं का पता
मैं अपनी परछाईं से पूछता हूँ रोज़,
तू मेरे साथ चलती है,
तो क्या तू भी थकती है?
वह कुछ नहीं बोलती,
बस ढलती जाती है शाम के साथ।
जैसे हर जवाब एक ढलती रोशनी में छुप जाता है।
मैंने कई बार सोचा,
काश मैं भी परछाईं होता,
न रूप होता, न दाग़ होता,
बस होता किसी के साथ,
बिना किसी वजह के।
लेकिन परछाईं का भी एक दर्द है,
वह सिर्फ़ तब दिखती है
जब रोशनी होती है।
अँधेरे में वह भी अकेली होती है।
जैसे मैं।