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परछाईं का पता

wordsofaditya Poetry · melancholic

परछाईं का पता

मैं अपनी परछाईं से पूछता हूँ रोज़,
तू मेरे साथ चलती है,
तो क्या तू भी थकती है?

वह कुछ नहीं बोलती,
बस ढलती जाती है शाम के साथ।
जैसे हर जवाब एक ढलती रोशनी में छुप जाता है।

Aditya Sharma 1 / 3
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मैंने कई बार सोचा,
काश मैं भी परछाईं होता,
न रूप होता, न दाग़ होता,
बस होता किसी के साथ,
बिना किसी वजह के।

Aditya Sharma 2 / 3
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लेकिन परछाईं का भी एक दर्द है,
वह सिर्फ़ तब दिखती है
जब रोशनी होती है।
अँधेरे में वह भी अकेली होती है।

जैसे मैं।

Aditya Sharma 3 / 3