ज़िंदगी बेचने वाले
philosophical
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ज़िंदगी बेचने वाले
उसने मुझसे पूछा,
"तुम क्या बेचते हो?"
मैंने कहा, "कुछ नहीं।"
उसने हँसकर कहा,
"झूठ मत बोलो,
हर आदमी कुछ न कुछ बेचता है।
कोई वक़्त बेचता है,
कोई ख़्वाब बेचता है,
कोई अपनी चुप्पी बेचता है।"
मैंने सोचा,
और फिर कहा,
"तो शायद मैं
अपने सवाल बेचता हूँ।"
उसने पूछा, "कोई ख़रीदता है?"
मैंने कहा, "नहीं।
इसीलिए मैं
अभी तक ग़रीब हूँ।"