क़ानून और इंसाफ़
philosophical
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क़ानून और इंसाफ़
क़ानून की किताब में
हर बात लिखी है।
लेकिन उस भूखे बच्चे के लिए
कोई धारा नहीं,
जो रात को सड़क पर सोता है
और सुबह उठकर
किसी के जूते पोंछता है।
मैंने पढ़ा है,
अनुच्छेद 21,
जीने का अधिकार।
पर जीने और
सिर्फ़ साँस लेने में
फ़र्क़ होता है।
एक अधिकार काग़ज़ पर है,
एक हक़ीक़त ज़मीन पर।
और दोनों के बीच
बस इतनी दूरी है,
जितनी एक जज की कुर्सी से
उस बच्चे की सड़क तक।