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असंतुलित स्वरूप

wordsofaditya Poetry · philosophical

असंतुलित स्वरूप

धूप की जो भूख है,
असंतुलित स्वरूप है।
हर सकल हंस में राम है,
लेकिन हर देश में विवाद है।
हर मिट्टी का एक दाम है,
हर किनारे एक घाट है।
शिव का एक जादू है,
काशी में हर साधु है।

Aditya Sharma 1 / 3
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अंतर्मन में भेद है,
रुकावट के लिए खेद है।
भूख अब मर गई,
हर आत्मा अब झुलस गई।
दरिया अभी दूर है,
दिल्ली अभी पास है।
सरकार के अब देश हैं,
जो भगवा है, विशेष है।

Aditya Sharma 2 / 3
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शिव का एक जादू है,
काशी में हर साधु है।

Aditya Sharma 3 / 3