असंतुलित स्वरूप
philosophical
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असंतुलित स्वरूप
धूप की जो भूख है,
असंतुलित स्वरूप है।
हर सकल हंस में राम है,
लेकिन हर देश में विवाद है।
हर मिट्टी का एक दाम है,
हर किनारे एक घाट है।
शिव का एक जादू है,
काशी में हर साधु है।
अंतर्मन में भेद है,
रुकावट के लिए खेद है।
भूख अब मर गई,
हर आत्मा अब झुलस गई।
दरिया अभी दूर है,
दिल्ली अभी पास है।
सरकार के अब देश हैं,
जो भगवा है, विशेष है।
शिव का एक जादू है,
काशी में हर साधु है।