अधूरा आदमी
melancholic
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अधूरा आदमी
मैं रोज़ सुबह उठता हूँ,
आईने के सामने खड़ा होता हूँ,
और देखता हूँ,
कि रात भर कितने टुकड़े हो गए।
फिर उन्हें समेटता हूँ,
जेब में डालता हूँ,
और निकल पड़ता हूँ।
लोग पूछते हैं, "कैसे हो?"
मैं कहता हूँ, "ठीक हूँ।"
ठीक।
यह शब्द कितना थका हुआ है,
कितना झूठा है,
कितना ज़रूरी है।
अधूरा आदमी पूरे जवाब देता है,
यही उसकी सबसे बड़ी
थकान है।